उत्तराखंड: अब तक नहीं मिला न्याय! आखिर ज़िम्मेदार कौन ?


उत्तराखंड: प्रद्युम्न ठाकुर से मिलिए — सात वर्ष का एक मासूम बालक, दूसरी कक्षा का छात्र, जिसकी आँखों में अनगिनत सपने थे और चेहरे पर वह भोली मुस्कान, जो किसी का भी दिल जीत ले। वह अपनी बहन के साथ Ryan International School में पढ़ता था।


8 सितंबर 2017 की वह सुबह भी हर रोज़ की तरह सामान्य थी। सुबह लगभग 7:55 बजे उसके पिता वरुण ठाकुर उसे स्कूल गेट तक छोड़कर आए। प्रद्युम्न ने हाथ हिलाकर पिता को अलविदा कहा और अपना भारी बस्ता कंधे पर टाँगे स्कूल के भीतर चला गया। किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि यह पिता-पुत्र की अंतिम मुलाकात होगी।


स्कूल परिसर में प्रवेश के बाद वह अपनी कक्षा की ओर बढ़ रहा था, तभी उसे वॉशरूम जाने की आवश्यकता महसूस हुई। वह उसी शौचालय की ओर गया, जिसका उपयोग स्कूल स्टाफ तथा परिवहन कर्मचारी भी करते थे।
महज़ कुछ ही मिनटों बाद स्कूल में अफरा-तफरी मच गई। प्रद्युम्न गंभीर रूप से घायल अवस्था में पाया गया। उसे तत्काल अस्पताल ले जाया गया, किंतु तब तक बहुत देर हो चुकी थी। स्कूल प्रशासन ने प्रारंभ में उसके पिता को दुर्घटना की सूचना दी, पर अस्पताल पहुँचने पर उन्हें ज्ञात हुआ कि उनके पुत्र की हत्या हो चुकी है।


मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने तत्काल जांच शुरू की और शुरुआती चरण में बस कंडक्टर अशोक कुमार को गिरफ्तार किया गया। पुलिस ने एक प्रारंभिक थ्योरी प्रस्तुत की, किंतु इस पर कई प्रश्न उठे। मृतक के परिवार ने भी इस जांच पर असंतोष जताया और निष्पक्ष जांच की मांग की।
बढ़ते जनदबाव के बाद मामला Central Bureau of Investigation को सौंपा गया। सीबीआई जांच में अलग दिशा सामने आई और बाद में उसी विद्यालय के 11वीं कक्षा के एक छात्र को आरोपी बनाया गया। जांच एजेंसी के अनुसार, हत्या का उद्देश्य स्कूल की परीक्षाएँ और पेरेंट्स-टीचर मीटिंग टलवाना था।


इस खुलासे ने शुरुआती जांच पर गंभीर सवाल खड़े किए और अशोक कुमार के खिलाफ की गई कार्रवाई पर भी बहस छेड़ दी। इसके बाद यह कानूनी प्रश्न भी उठा कि 16 वर्ष से अधिक आयु के आरोपी पर वयस्क की तरह मुकदमा चलाया जाए या नहीं। अपराध की प्रकृति और परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने वयस्क ट्रायल का मार्ग प्रशस्त किया।
यह मामला केवल एक आपराधिक घटना नहीं रहा, बल्कि इसने स्कूलों में सुरक्षा व्यवस्था, जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली और किशोर मानसिक स्वास्थ्य पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस छेड़ दी।
आज भी प्रद्युम्न के पिता न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं। उनका कहना है—
“जब तक मेरे बेटे के हत्यारे को सजा नहीं मिलती, मेरी लड़ाई जारी रहेगी ।

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