उत्तराखंड : जब दिल वालों ने छोड़ दी दिल्ली ,,, क्यों कि दिल लगा बैठे उत्तराखंड से , और ये गजब कर डाला

Uttarakhand News : कभी-कभी हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी से बहुत थक जाते हैं और सोचते हैं कि क्यों ना किसी शांत पहाड़ी पर घूम आए या शोर-शराबे से कहीं दूर शांति में कुछ पल गुजारे जहां प्राकृतिक खूबसूरती हो और सोच से परे मानसिक शांति हो अब आप सोचिए अगर आपका घर ऐसी जगह पर बन जाए तो जिंदगी कितनी सुकून भरी होगी।

आज हम आपको बताने जा रहे हैं दिल्ली के रहने वाले अनिल चेरुकुपल्ली की और उनकी पत्नी अदिति के बारे में ।

थोड़ा समय पहले यह दिल्ली निवासी थे किंतु वर्तमान में यह उत्तराखंड निवासी हो गए हैं इस दंपति ने जीवन की थकान शोर-शराबे से दूर सादा जीवन जीने का विचार सन दो हजार अट्ठारह में बनाया जब वे शहरी जीवन की चमक दमक शोर-शराबे को त्याग कर उत्तराखंड आ बसे ।इन दिनों ने तय कर लिया था कि पहाड़ों पर अपना खूबसूरत आशियाना बनाएंगे। और जिंदगी के बचे हुए सालों को शांति और सुकून से गुजारेंगे परंतु उस समय इनके पास आर्किटेक्चर की कोई डिग्री नहीं थी ना ही कंस्ट्रक्शन कार्य का कोई अनुभव था। इसलिए उन्होंने अपने महीनों के शोध के बाद स्थानीय राजमिस्त्री ओं का सहयोग लिया ।अनिल और अदिति दोनों ही ट्रैवलिंग को पसंद करते हैं ।

इन दोनों को पर्यावरण के क्षेत्र में भी काम करने का बहुत अच्छा अनुभव है इन दोनों दंपति ने वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर और इकोसिस्टम के संरक्षण की दिशा में भी काम करने वाले गैर सरकारी संगठनों जिन्हें कि एनजीओ कहा जाता है मैं काम किया है ।दरअसल इस दंपत्ति का शहरी जीवन त्यागने का मुख्य उद्देश्य था कि यह सुकून और आराम की जिंदगी जीना चाहते थे ।शोर-शराबे से कहीं दूर ,खुद को प्रकृति के नजदीक रखना चाहते थे ।अनिल और अदिति चाहते थे कि उनके वहां जो भी मेहमान आए वह भी कुछ दिनों के लिए सुकून में रहे बस इसी बात ने इन दोनों को आगे के लिए यहां रचने बसने को प्रेरित किया ।

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अनिल और अदिति ने उत्तराखंड के फगुननिया क्षेत्र में 5000 फीट ऊपर “Faguniya farmstay “की स्थापना की जिसे यदि आप देख ले तो आपका मन खुश हो जाएगा ।घने जंगलों और झरनों के बीच तीन मंजिला घर ऐसा लगता है मानो हम साक्षात स्वर्ग के दर्शन कर रहे हों ।

इस घर की एक और खास बात यह है कि यह घर कुमाऊ के पारंपरिक आर्किटेक्चरल प्रैक्टिसेज से बनाया गया है ।जो कि पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ-साथ भूकंप प्रतिरोधी भी है। हर कुमाऊं स्ट्रक्चर की तरह इस घर को भी पत्थर और लकड़ी से कुछ इस तरह बनाया गया है कि जिससे घर का तापमान अनुकूल बना रहता है ।अनिल और उनकी पत्नी का कहना है कि इस घर को बनाने में जिस मटेरियल का इस्तेमाल हुआ है उस मटेरियल के कारण यह घर सदियों तक चलेगा। उनका कहना है कि घर के निर्माण के दौरान उन्होंने पहाड़ी ढलान ऊपर बिल्डिंग का दबाव कम करने के लिए अपनी साइट की पुरानी रूपरेखा का पालन किया ।इन दोनों दंपत्ति का कहना इस प्रक्रिया में इन्होंने ना ही किसी पेड़ को काटा है नहीं किसी नई पहाड़ी ढलानों को। इन दोनों दंपत्ति की दिल्ली में जॉब थी उनके लिए यह आसान नहीं था कि कार्बन फुटप्रिंट जनरेट किए बिना कुमायूं शैली का घर बनाना।

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इसलिए उनके सपनों के घर को बनाने में 2 साल से अधिक का समय लगा ।इस घर की दीवारों और छत स्वदेशी आर्किटेक्चरल स्टाइल में बनाने के लिए हिमालय लैंडस्केप के स्थानीय संसाधनों जैसे पत्थर और लकड़ी का भरपूर इस्तेमाल किया गया है ।उनके काम के लिए सीमेंट का एक छोटा सा हिस्सा प्राइमरी बॉन्डिंग मटेरियल के रूप में इस्तेमाल किया गया है ।अदिति कहती है कि उनके घर के लिए 70% से अधिक लकड़ी और पत्थर पहले से ही उनके साइट पर मौजूद थे ।

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इस घर की खिड़कियां इस प्रकार बनाई गई है जिससे कि घर में भरपूर प्राकृतिक रोशनी आ सके और सुबह उठने पर प्राकृतिक सौंदर्य का नजारा आंखों के सामने हो। दंपति ने बताया की 2 फुट मोटी पत्थर की दीवार इस घर को गर्मियों में ठंडा और सर्दियों में गर्म रखने में मदद करती है ।क्योंकि वह ऐसे पहाड़ी जगह पर है जहां अमिमुन साल भर मौसम ठंडा ही रहता है ।इसलिए कुमाऊं के हर घर की तरह इस घर मैं भी कॉम्पैक्ट है ।जो इसे आरामदायक बनाता है। इस घर में अधिकतर इंटीरियर में टेबल कुर्सी और एक बुक सेल्फ जैसे फर्नीचर का प्रयोग किया गया है। जो इसे और भी ज्यादा अट्रैक्टिव बनाता है।

आगे अनिल और अदिति ने बाथरूम के लिए भी एक सेंडलिसेडसौर वाटर हीटर के साथ सौर ऊर्जा बैकअप इन्वर्टर सिस्टम भी लगाया है जो कि प्रतिदिन लगभग 5 से 8 यूनिट ऊर्जा उत्पन्न करता है।

एक खूबसूरत घर बनाने के अलावा इस दंपति ने प्राकृतिक उर्वरकों का उपयोग हल्दी ,अदरक, ककड़ी, तोरी, शिमला मिर्च ,बैंगन जैसे जैविक खाद पदार्थों को उगाने के लिए भी किया है ।आगे यह दोनों दंपत्ति अपने प्लॉट पर पर्माकल्चर खेती को लागू करने की इच्छा रखते हैं ।

इन दोनों दंपत्ति का कार्य सराहनीय है