Uttarakhand: नवरात्रि में इंसानियत शर्मसार, शव घर में लाने से रोका!

गुना। देशभर में नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा की आराधना की जा रही है। लोग शक्ति स्वरूपा मां की पूजा-अर्चना कर रहे हैं, लेकिन मध्य प्रदेश के गुना से सामने आई एक घटना ने इंसानियत और मानवीय संवेदनाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कैंसर से पीड़ित 31 वर्षीय पूजा रजक की मौत के बाद कथित तौर पर मकान मालिक ने नवरात्रि का हवाला देते हुए उनके शव को घर में लाने से रोक दिया।

जानकारी के मुताबिक, पूजा रजक कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रही थीं। बीमारी के दौरान उनके पति ने उन्हें घर से निकाल दिया था, जिसके बाद वह अपने माता-पिता के साथ किराए के मकान में रहने लगी थीं। पूजा के तीन बच्चे भी हैं। लंबी बीमारी के बाद उनकी मौत हो गई, जिससे परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा।

नवरात्रि का हवाला देकर शव लाने से रोकने का आरोप
परिजनों के अनुसार, पूजा की मौत के बाद जब परिवार उनके शव को किराए के मकान में ले जाना चाहता था, तब मकान मालिक ने कथित तौर पर नवरात्रि चलने का हवाला देते हुए शव को घर में लाने की अनुमति नहीं दी। इस घटना ने दुख की घड़ी में परिवार की मुश्किलें और बढ़ा दीं।
बताया जा रहा है कि ऐसी परिस्थितियों में मजबूर पिता को जिला अस्पताल में ही अपनी बेटी का सुहागन के रूप में श्रृंगार करना पड़ा। इसके बाद शव को अंतिम संस्कार के लिए मुक्तिधाम ले जाया गया, जहां पूजा की अंत्येष्टि की गई।

धर्म से बड़ा है इंसानियत का धर्म
यह घटना समाज के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा करती है कि जब कोई परिवार अपने जीवन के सबसे कठिन दौर से गुजर रहा हो, तब क्या धार्मिक मान्यताओं के नाम पर उसके दुख को और बढ़ाना उचित है? नवरात्रि में मां दुर्गा की पूजा की जाती है, जिन्हें शक्ति और करुणा का प्रतीक माना जाता है। ऐसे में किसी बेटी की मृत्यु के बाद उसके परिवार के प्रति संवेदनशीलता दिखाना ही सच्चे मानवीय मूल्यों की पहचान है।

पूजा रजक की मौत ने न केवल एक परिवार को गहरे दुख में डुबो दिया, बल्कि समाज में मानवीय संवेदनाओं और धार्मिक आस्थाओं के वास्तविक अर्थ पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिरकार, धर्म का मूल उद्देश्य करुणा, प्रेम और सेवा है। यदि दुख की घड़ी में हम किसी के साथ संवेदना तक नहीं दिखा सकते, तो हमारी धार्मिक आस्था का वास्तविक अर्थ क्या रह जाता है?

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