उत्तराखण्ड

उत्तराखंड: स्वरोजगार से इस युवा ने बनाई अपनी अलग पहचान, जानिए कौन है ये

नैनीताल- कहते हैं अगर आपके भीतर कुछ अलग करने का जुनून हो तो रास्ते खुद ब खुद निकल कर सामने आते हैं, ऐसा ही कुछ नैनीताल जिले के दूरस्थ क्षेत्र मोरा गांव के हीरा सिंह जीना ने किया है जिन्होंने लॉकडाउन के दौरान नौकरी छूट जाने पर खुद का स्वरोजगार शुरू किया और आज अपने स्वरोजगार के बदौलत एक अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं साथ ही दूसरे बेरोजगार युवाओं के लिए प्रेरणा भी हैं।

दरअसल हीरा सिंह लॉकडाउन में नौकरी छूट जाने के बाद मसूरी से अपने गांव आ गए और उन्होंने काफी खोजबीन के बाद देसी मधुमक्खी पालने का विचार बनाया। आमतौर पर लोग मेलीफेरा प्रजाति की मधुमक्खी पालते हैं, लेकिन हीरा ने देसी मधुमक्खी पालने पर ही विचार किया क्योंकि देसी मधुमक्खी विलुप्त की कगार पर है,और इसका शहद बेहद महत्वपूर्ण है। यह शहद बाजार में ₹800 से पंद्रह सौ रुपए तक बिकता है। जबकि मेलीफेरा प्रजाति की मधुमक्खी का शहद ₹200 से ₹300 मैं बाजार में आसानी से उपलब्ध है । जानकारी जुटाकर हीरा ने देसी मधुमक्खी पालन शुरू किया देसी यानी भारतीय मौन जिसे वैज्ञानिक भाषा में एपिस सिराना इंडिका बोलते हैं। उनकी दो कॉलोनी से शुरुआत की।

हीरा बताते हैं कि उन्होंने दो मधुमक्खी की कॉलोनी से इसकी शुरुआत की। राजकीय मौन पालन केंद्र ज्योली कोट ने हीरा की इस नए स्वरोजगार में पूरी मदद की क्योंकि यह देसी मधुमक्खी आसानी से नहीं मिलती है, और इसे पालने से इसका मुनाफा भी बेहद अच्छा होता है। लॉकडाउन में दो मधुमक्खी की कॉलोनी से शुरुआत कर अपने स्वरोजगार को आगे बढ़ा कर हीरा ने आज 30 कॉलोनी विकसित कर दी है। जिसमें देसी मधुमक्खी बड़े पैमाने पर शहद बनाती हैं। हीरा के पिताजी रणजीत सिंह गांव में ही कृषि और मजदूरी करते हैं जबकि बड़े भाई नीरज मधुमक्खी पालने का काम 2010 से कर रहे हैं हीरा ने उनसे ही मधुमक्खी पालने का काम लॉकडाउन में सीखा।

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कुछ नया करने की चाहत रखने वाले हीरा ने देसी मधुमक्खी को पालने की शुरुआत पुराने पारंपरिक तरीके से की, जिसमे पुराने घरों में जालो में मधुमक्खी पालन करते थे। जिसके बाद अब उन्होंने आधुनिक तरीके से मौन बॉक्स बनाकर उनमें पालनी शुरू कर दी है।

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पंतनगर से आईटीआई करने के बाद नौकरी करने वाले हीरा लॉकडाउन में नौकरी चले जाने के बाद इस समय स्वरोजगार से अच्छा खासा मुनाफा उठा रहे हैं। हीरा सिंह जीना का कहना है देसी मधुमक्खी का शहद साल भर में 2 बार निकाला जाता है। पहला अप्रैल-मई और दूसरा नवंबर दिसंबर और यह देसी मधुमक्खी अपने आप से अपना भोजन तलाश लेती है इनको एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाना भी जरूरी नहीं है। और इसे ऑर्गेनिक और शुद्ध भी माना जाता है यही वजह है कि इसका दाम सामान्य मधुमक्खी के शहद से 5 गुना अधिक है।

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हीरा का कहना है कि वह अपने शहद का परीक्षण पंतनगर लैब में करवाते हैं। शहद के साथ साथ वह मधुमक्खी के पुराने हो गए छत्तो से मोम वैक्स भी निकालते हैं जो कि ₹300 प्रति किलो बिकता है, इसके अलावा हनी का पोलन भी कई प्रकार के काम में आता है। पहाड़ी परिवेश में विषम परिस्थितियों में नहीं तरीके का स्वरोजगार कर हीरा सिंह जीना ने नए युवाओं के सामने भी मौन पालन करते हुए स्वरोजगार का नया मॉडल रखा है जिसे युवा आसानी से शुरू कर सकते हैं।

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