उत्तराखण्ड

कुमाऊं में आज मनाया जाएगा बिरुढ़ पंचमी का पर्व 2 दिन बाद सातूं – आठु। जानिए क्यों है ये खास

Kumaun News. : माता गौरी और भगवान महेश की पूजा का लोक पर्व सातों – आठु करीब है।
प्रत्येक वर्ष यह पर्व भाद्रपद यानी भादो मास के शुल्क पक्ष की सप्तमी – अष्टमी को मनाया जाता है। इस बार 29 अगस्त को सातूं व 30 अगस्त को आठु पर्व मनाया जाएगा।

इस पर्व को मनाने के पीछे एक अत्यंत प्राचीन कहानी है। ऐसा कहा जाता है कि एक बार मां गौरा सप्तमी को अपनी ससुराल से रूठ कर अपने मायके आ जाती है फिर उन्हें लेने के लिए भगवान महेश अष्टमी को उनके मायके जाते हैं ।

सातूं -आठु में सप्तमी के दिन मां गौरा अष्टमी के दिन भगवान शिव की मूर्ति बनाई जाती है। मूर्ति बनाने के लिए मक्का ,तेल, बाजरा आदि के पौधों का प्रयोग होता है ।माता की मूर्ति बनाकर उन्हें सुंदर वस्त्र पहनाए जाते हैं एवं आभूषणों से सुसज्जित किया जाता है। विधि अनुसार उसका पूजन किया जाता है ।उत्तराखंड में कुमाऊनी चाचरी गाते हुए गोरा महेश के प्रतीकों को खूब नचाया जाता है।

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महिलाएं दोनों दिन उपवास रखती हैं। अष्टमी की सुबह गौरा – महेश को बिरूर चढ़ाए जाते हैं । प्रसाद स्वरूप इसे सभी लोगों में बांटा जाता है ।और गीत गाते हुए मां गौरा को ससुराल के लिए विदा किया जाता है ।मां गौरा की मूर्ति को स्थानीय मंदिर या नौला( प्राकृतिक जल स्रोत) के पास विसर्जित किया जाता है ।कुछ जगहों पर तो 2 से 3 दिन भी से विसर्जित किया जाता है।

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सातूं – आठु का जहां एक और धार्मिक महत्व है वहीं दूसरी ओर इसका वैज्ञानिक महत्व भी है। लोक पर्व सातु आठु की शुरुआत 2 दिन पहले से ही हो जाती है ।

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भादो मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को बिरुड़ पंचमी कहा जाता है। इस दिन घरों में महिलाएं तांबे के बर्तन में 5 अथवा 7 प्रकार के अनाजों को पानी में भिगोकर रखती हैं ।जिसमें दाड़िम , हल्दी सरसों दुर्बा के साथ एक सिक्के की पोटली रखी जाती है । सातूं के दिन महिलाएं बांह में डोर धारण करती हैं । जबकि आठों के दिन गले में दुबड़ा अर्थात लाल धागा धारण करती हैं और माता गौरा से और भगवान महेश से पाने परिवार और समाज के कल्याण की कामना करती हैं ।

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