हल्द्वानी में कुमाऊनी–बुंदेली भाषा पर ऐतिहासिक गोष्ठी व MoU, लोकभाषाओं के संरक्षण और वैश्विक पहचान पर जोर।

Uk positive news: ,उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय हल्द्वानी में शनिवार को शैक्षिक समझौता एवं विचार गोष्ठी का आयोजन, गोष्ठी में कुमाऊनी एवं बुंदेली भाषा संस्कृति एवं शोध पर बातचीत की गई
बोली भाषा के लोगों में मित्र भाव से ही भारतीय भाषाओं की वैश्विक पहचान बनेगी। प्रो. नवीन चन्द्र लोहनी। कुलपति, उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय
गोष्ठी में अपने उद्बोधन में जिलाधिकारी ललित मोहन रयाल ने अपने वक्तव्य में कहा कि क्षेत्रीय बोलियां आपस में अंतर्गुम्फित अर्थात आपस में गुथा हुवा रहती है। उन्होंने ज्ञान चतुर्वेदी के उपन्यासों और आलेखों का उल्लेख करते हुए कहा कि इनकी रचनाओं में हमें बुंदेली संस्कृति की झलक मिलती है। वहीं शेर दा अनपढ़ की रचनाओं में कुमाऊनी संस्कृति की झलक मिलती है। उन्होंने कहा लोकबोली में किसी परिमार्जित भाषा से कहीं अधिक पारंपरिक ज्ञान समाहित होती है। उन्होंने कहा कि हमारे पुरखे जब मुहावरों में बोलते हैं तो उनमें उनका अनुभव बोलता है। यह आयोजन लोकबोलियों के संरक्षण संवर्धन में कारगर होगा।
उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय, हल्द्वानी एवं बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झांसी के मध्य शैक्षिक सहयोग को सुदृढ़ बनाने तथा क्षेत्रीय भाषाओं, संस्कृति एवं शोध के विविध आयामों पर विचार-विमर्श हेतु “शैक्षिक समझौता एवं विचार-गोष्ठी” का आयोजन शनिवार, 04 अप्रैल 2026 को विश्वविद्यालय के केंद्रीय सभागार में किया गया।
कार्यक्रम का विचार सत्र कुमाऊनी एवं बुंदेली भाषा के संस्कृति एवं शोध पर केंद्रित था।
कार्यक्रम में कुलपति प्रो. नवीन चन्द्र लोहनी ने कहा कि यह सहयोग न केवल अकादमिक उन्नयन का माध्यम बनेगा, बल्कि क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। उन्होंने आगे जोड़ा कि विश्वविद्यालयों का दायित्व है कि वे लोक और शास्त्र के बीच सेतु का कार्य करें। बोली भाषा के लोगों में मित्र भाव आए और इससे एक वैश्विक पहचान बने। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय भाषाओं को लेकर सजग रहा है। आगामी दिनों में अपभ्रंश, प्राकृत, पालि, जापानी, स्पेनिश, चीनी, जौनसारी भाषा में प्रमाण पत्र कार्यक्रम शुरू कर रहा है। जबकि विश्वविद्यालय संस्कृत, उर्दू, नेपाली, कुमाऊनी, गढ़वाली, हिंदी में विभिन्न कार्यक्रम संचालित कर रहा है।
विचार गोष्ठी के पहले वक्ता के रूप में मानविकी विद्याशाखा के निदेशक प्रो. गिरिजा प्रसाद पांडे ने अपने वक्तव्य में कहा कि कुमाऊनी और बुंदेली जैसी भाषाएं लोकजीवन की संवेदना को अभिव्यक्त करती हैं। इन्हें अकादमिक विमर्श में स्थान देना समय की मांग है। उन्होंने विश्वविद्यालयों के बीच इस समझौते को ज्ञान-विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण बताया। साथ ही इस समझौते को एवं लोक भाषा एवं संस्कृति पर बातचीत राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के स्वप्नों को साकार करने वाली पहल है। बुंदेली और कुमाउनी लोकगीत में आल्हा ऊदल हैं तो कुमाउनी में राजुला मालूशाही हैं। दोनों ही तरह की लोक संस्कृति में एक सूत्रता देखने को हमें मिलती है।
कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. दिवा भट्ट ने अपने उद्बोधन में कहा कि कुमाऊनी और बुंदेली भगिनी भाषा है। दोनों भाषाओं में विभिन्नताओं के बावजूद इनमें कुछ समानताएं भी हैं। आगे प्रो. दिवा भट्ट ने कहा कि कुमाऊनी भाषा का साहित्य अत्यंत समृद्ध है, किंतु इसे मुख्यधारा के साहित्यिक विमर्श में अपेक्षित स्थान नहीं मिल पाया है। इसका कारण स्पष्ट है कि कुमाऊनी साहित्य मौखिक ही रहा है। इस प्रकार की गोष्ठियां उस अंतर को पाटने का कार्य करती हैं।
बुंदेलखंड विश्वविद्यालय से आईं डॉ. सुनीता वर्मा ने कहा कि बुंदेली भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि लोक संस्कृति, लोकगीतों और परंपराओं का जीवंत दस्तावेज है। वहीं डॉ. सुधा दीक्षित ने अपने विचार रखते हुए कहा कि कुमाउनी और बुंदेली भाषाओं के तुलनात्मक अध्ययन से भारतीय भाषाई विविधता की गहरी समझ विकसित की जा सकती है। डॉ. दीक्षित ने कहा कि आज यहां बुंदेली और कुमाउनी का सम्मिलन हुआ है। उन्होंने विविध उदाहरण से बुंदेली की समृद्ध संस्कृति को रेखांकित किया।
विशिष्ट अतिथि प्रो. पुनीत बिसारिया ने सबसे पहले बुंदेली संस्कृति और साहित्य की विपुलता का संक्षिप्त परिचय दिया। उन्होंने कहा कि यह समझौता दोनों विश्वविद्यालयों के बीच शोध, पाठ्यक्रम विकास और छात्र-शिक्षक आदान-प्रदान के नए अवसर खोलेगा। अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा कि स्थानीय भाषाओं को वैश्विक संदर्भ में प्रस्तुत करना हमारी साझा जिम्मेदारी है।
कार्यक्रम की मुख्य अतिथि प्रो. सविता मोहन नेे कहा कि जब तक हमारी शिक्षा प्रणाली में क्षेत्रीय भाषाओं को उचित स्थान नहीं मिलेगा, तब तक हम अपनी सांस्कृतिक जड़ों से पूर्णतः जुड़ नहीं पाएंगे। उन्होंने इस पहल को शिक्षा के भारतीयकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। उन्होंने कहा कि बुंदेलखंड से हमारा पहला परिचय वृन्दावनलाल वर्मा और मैत्रेयी पुष्पा की रचनाओं से हुआ। बुंदेलखंड का साहित्य समृद्ध है। आज हमें आधुनिक जीवन को लेकर लोक गीत और साहित्य रचने की आवश्यकता है। वहीं उत्तराखंड वीरों की धरती है। यहां हरेक घर में एक शहीद पैदा होता है। हमें इनपर भी लोकगीत संरक्षित करने की जरूरत है। उत्तराखंड में साहित्य की समृद्ध परंपरा रही है। उत्तराखंड का वैभव यहां के प्राकृतिक दृश्यों में छुपा हुआ है। हमें बेहद सावधानी से इसे देखने की जरूरत है। प्रेम और प्रकृति का जीवंत, अटूट एवं मूर्तिमान स्वरूप आपको उत्तराखंड में देखने को मिलता है।
कार्यक्रम के दौरान दोनों विश्वविद्यालयों के मध्य औपचारिक रूप से समझौता ज्ञापन (mou) का हस्तांतरण भी किया गया, जो शैक्षिक एवं शोध सहयोग की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। साथ ही बहुभाषिक त्रैमासिक पत्रिका ज्ञानगृह के प्रवेशांक का लोकार्पण किया गया।
तत्पश्चात कुलगीत का प्रसारण किया गया और स्वागत सत्र संपन्न हुआ। कार्यक्रम के संयोजक डॉ. शशांक शुक्ल ने कहा कि क्षेत्रीय भाषाओं का संरक्षण केवल सांस्कृतिक दायित्व नहीं, बल्कि ज्ञान-परंपरा को जीवित रखने का माध्यम भी है। डॉ. शुक्ल ने कहा कि छोटी छोटी संस्कृतियां ही धीरे धीरे बड़ी संस्कृति बन जाती हैं जब उन्हें समाज स्वीकृति दे और संरक्षित करे।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. अनिल कार्की ने किया तथा धन्यवाद उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के कुलसचिव श्री खेमराज भट्ट ने किया, श्री भट्ट ने कहा कि “यह आयोजन दोनों विश्वविद्यालयों के बीच दीर्घकालिक शैक्षिक संबंधों की मजबूत नींव रखेगा।” इस अवसर बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के छात्र छात्राओं ने विविध प्रस्तुति दी। प्रदीप कुमार ने आल्हा का गायन किया। खुशी रावत ने स्वागत गीत पर नृत्य की मोहक प्रस्तुति दी। छात्र अनुराग ने जनम दइयों विधाता बुंदेलखंड में गीत की प्रस्तुति दी। छात्र सुंदरम ने बुंदेलखंडी में कविता का पाठ किया साथ ही उन्होंने अपनी स्वरचित कविता भी सुनाई। छात्रा शिवानी ने बुंदेलखंडी भाषा में संस्कृति पर केंद्रित गद्य का पाठ किया। विश्वविद्यालय की छात्रा संजना प्रजापति, पायल गायकवाड़। खुशी रावत और वैशाली रावत ने राई नृत्य की प्रस्तुति दी। स्नातक के तृतीय वर्ष के छात्र अमित अहिरवार ने बुंदेलखंड के लोकदेवताओं की विशिष्टताओं को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि बुंदेली लोक संस्कृति भारतीय संस्कृति का ही लघुरूप है।
इस अवसर पर बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के शिक्षक डॉ. श्रीहरि त्रिपाठी, डॉ. बिपिन प्रसाद डॉ. सुनीता वर्मा, डॉ. प्रेमलता, डॉ. सुधा दीक्षित, डॉ. द्युति मालिनी, कल संकाय के शोधार्थी और परास्नातक एवं स्नातक के छात्र-छात्राएं भी कार्यक्रम में मौजूद रहे। साथ ही उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के विभिन्न विद्याशाखाओं के निदेशक, शिक्षक एवं कार्मिक मौजूद रहे।


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