उत्तराखण्ड

उत्तराखंड- जानिए आखिर क्यों है महासू मंदिर हनोल के देव फुलवारी की परंपरा, बड़ी ही रोचक और चमत्कारिक है इसका इतिहास

Uttrakhand News – चकराता : जौनसार बावर का प्रमुख धाम एवं सिद्ध पीठ श्री महासू देवता मंदिर हनोल सदियों से एक विशेष आकर्षण का केंद्र रहा है मंदिर के विशेष आकर्षण का केंद्र बनने की जो वजह है वह अत्यंत ही खास और अलग है । दरअसल महासू देवता के मंदिर मैं बनी फुलवारी बिना किसी पौध बिना किसी बीज के कुदरती तौर पर जमीन से स्वयं उगती है जिसमें नगरास के सुगंधित फूल सदियों से उगते रहे हैं और इन नगरास के फूलों को महासू देवता पर चढ़ाना अत्यंत ही पवित्र और शुभ माना जाता है ।चमत्कारिक बात यह है कि देवता की इस भूमि पर बिना किसी प्रकार के पौधे लगाए वह बीजों को अंकुरित किए ही कुदरती तरीके से अपने आप ही जमीन के अंदर से खूबसूरत नगरास के सुगंधित पुष्प सदियों से उगते चले आ रहे हैं। परंतु अगर हम दूसरी तरफ देखें तो यह बात बड़ी ही अजीब लगती है कि बिना किसी पौधे एवं पुष्प को उगाए ऐसा कैसे संभव है? किंतु देवता की चमत्कारिक शक्ति के आगे सब सम्भव होजाता है । ऐसी आस्था वहां के निवासियों तांदूर मुहासे ( वहां की प्रजाति ) की भी है ।

जौनसार बावर के प्रमुख धाम एवं सिद्ध पीठ श्री महासू देवता मंदिर हनोल में देवता की जो फुलवारी है उस फुलवारी को यदि एक निश्चित तिथि पर वहां के लोग खुदाई करते हैं तो वहां कुदरती तरीके से बेहद खूबसूरत नगरास के सुगंधित फूल स्वयं ही खेलते हैं। इसकी खूबसूरती देखते बनती है यह किसी चमत्कार से कम नहीं लगता। यदि मान्यताओं एवं पौराणिक कथाओं को माने तो आज से लाखों सैकड़ों वर्ष पहले महासू मंदिर हनोल की देव फुलवारी जिसे कि वहां की स्थानीय भाषा में कुंगवाड़ कहा जाता है की खुदाई हर वर्ष 25 गते सावन मास की रात को जंगली जानवर स्वयं किया करते थे। ऐसा बताया जाता है कि रात के अंधेरे में आकर जंगली जानवर देव फुलवारी की खुदाई अपने हाथों के पंजों से करके सुबह होने से पहले गायब हो जाया करते थे। तांदूर मुहासे जब सुबह उठ के ये सब देखते थे तो हैरान हो जाते थे एवं जुबान तले उंगलियां दबा लेते थे। यह सब देख कर तांदूर मुहासों को लगा कि इस घटना का पता करना चाहिए अतः उन्होंने नियत तिथि पर रात को हथियारों से लैस होकर मंदिर के बाहर घात लगाकर बैठना आरंभ कर दिया तभी जंगली सूअर आकर अपने पंजों से देव फुलवारी की खुदाई करने लगे यह देखकर तांदूर मुहासों ने सारे जंगली सुअरों पर हमला करके 1 – 1 को मार दिया । इसका असर यह रहा कि कई वर्षों तक मंदिर की खूबसूरती को बढ़ाने वाले नगराज के सुगंधित फूल वहां नहीं उग पाए और जिसका दुष्परिणाम और दंश वहां के लोगों को झेलना पड़ा या यूं कह लें के देवता का अभिशाप उन्हें लग गया ।इस दोष से मुक्त होने के लिए तांदूर मुहासों ने देवता से सर्वप्रथम क्षमा मांगी और खुद को
को इस अभिशाप से मुक्त करने की गुहार लगाई ।तब स्वयं देवता ने प्रकट होकर कहा कि अब से एक नियत तिथि पर उनके देव की फुलवारी की खुदाई वहां के लोगों को स्वयं करनी होगी तभी वे श्राप से मुक्त होंगे और नगरास के खूबसूरत फूल पुनः मंदिर की फुलवारी में उगेंगे तथा मंदिर की फुलवारी की शोभा बढ़ाएंगे बस तब से ही देवता की आज्ञा का पालन करके तांदूर मुहासे मंदिर की खुदाई स्वयं करते आ रहे हैं और पहले की भांति वहां पर खूबसूरत नगरास के सुगंधित पुष्प पुनः खिलने लगे इस प्रकार से इस परंपरा को वहां के लोगों ने आज तक चलाया है और प्रति वर्ष नियत तिथि पर नगरास के खूबसूरत फूल हनोल देवता की फुलवारी की शोभा बढ़ाते रहें।

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