उत्तराखण्ड

उत्तराखंड : हल्द्वानी के इस क्षेत्र में निकली मां दुर्गा की भव्य कलश यात्रा, प्रथम नवरात्रि पर किया माता रानी का स्वागत

Uttarakhand News : नवरात्रि पर्व, माँ-दुर्गा की अवधारणा, भक्ति और परमात्मा की शक्ति (उदात्त, परम, रचनात्मक ऊर्जा) की पूजा का सबसे शुभ और अनोखी अवधि मानी जाती है।

यह पूजा वैदिक युग से पहले, प्रागैतिहासिक काल से चली आ रही है। ऋषि के वैदिक युग के बाद से, नवरात्रि के दौरान की गयी भक्ति बहुत अधिक शक्ति शाली मानी जाती है ।

ऐसी मान्यता है कि माता रानी से जो भी मनोकामनाएं मांगी जाती है उसे माता रानी पूरा करती है और भक्तों की झोली को खुशियों से भर देती है।

माता रानी अपने भक्तों पर आने वाले कष्ट को भी हर लेती है और उनके जीवन में खुशियां और सुख शांति प्रदान करती है।

आज नवरात्रि के प्रथम दिन हल्द्वानी के घोड़ानाला , बिन्दुखत्ता , पटेल नगर क्षेत्र में जय मां दुर्गा कमेटी द्वारा मां दुर्गा के मंदिर में माता रानी की मूर्ति की स्थापना की गई साथ ही माता रानी की भव्य कलश यात्रा निकाली गई।

यह भी पढ़ें 👉  हल्द्वानी- बॉलीवुड अभिनेता हेमंत पांडे पहुंचे Haldwani, कही यह बात

माता रानी की मूर्ति स्थापना से ग्रामीण वासियों में एवं जय मां दुर्गा कमेटी के सदस्यों में खुशी का माहौल है सारे ग्रामीण वासियों ने और जय मां दुर्गा कमेटी के सदस्यों ने माता रानी का भव्य स्वागत किया। कलश यात्रा में जहां एक और बड़े बुजुर्ग महिलाएं, और पुरुष दिखे वहीं दूसरी ओर छोटे-छोटे बच्चे भी कलश यात्रा की शोभा को बढ़ा रहे थे।

कलश यात्रा का महत्व-

सभी धार्मिक कार्यों में कलश का बड़ा महत्व है। जैसे मांगलिक कार्यों का शुभारंभ, नया व्यापार, नववर्ष आरंभ, गृह प्रवेश, दिवाली पूजन, यज्ञ, अनुष्ठान, दुर्गा पूजा आदि के अवसर पर सबसे पहले कलश स्थापना की जाती है।

धर्मशास्त्रों के अनुसार कलश को सुख-समृद्धि, वैभव और मंगल कामनाओं का प्रतीक माना गया है। देवी पुराण के अनुसार मां भगवती की पूजा-अर्चना करते समय सर्वप्रथम कलश की स्थापना की जाती है। नवरा‍त्रि के दिनों में मंदिरों तथा घरों में कलश स्थापित किए जाते हैं तथा मां दुर्गा की विधि-विधानपूर्वक पूजा-अर्चना की जाती है।

यह भी पढ़ें 👉  उत्तराखंड : कोटद्वार के रोहित का हुआ international कंपनी में चयन, जानिए कितने का है पैकेज

यह कलश विश्व ब्रह्मांड, विराट ब्रह्मा एवं भू-पिंड यानी ग्लोब का प्रतीक माना गया है। इसमें सम्पूर्ण देवता समाए हुए हैं। पूजन के दौरान कलश को देवी-देवता की शक्ति, तीर्थस्थान आदि का प्रतीक मानकर स्थापित किया जाता है।

कलश के मुख में विष्णुजी का निवास, कंठ में रुद्र तथा मूल में ब्रह्मा स्थित हैं और कलश के मध्य में दैवीय मातृशक्तियां निवास करती हैं।

कलश में भरा पवित्र जल इस बात का संकेत हैं कि हमारा मन भी जल की तरह हमेशा ही शीतल, स्वच्छ एवं निर्मल बना रहें। हमारा मन श्रद्धा, तरलता, संवेदना एवं सरलता से भरे रहें। यह क्रोध, लोभ, मोह-माया, ईष्या और घृणा आदि कुत्सित भावनाओं से हमेशा दूर रहें।

कलश पर लगाया जाने वाला स्वस्तिष्क का चिह्न चार युगों का प्रतीक है। यह हमारी 4 अवस्थाओं, जैसे बाल्य, युवा, प्रौढ़ और वृद्धावस्था का प्रतीक है।

यह भी पढ़ें 👉  उत्तराखंड: हल्द्वानी के इस शिक्षक की जिंदगी बदल दी थी इक हादसे ने

पौराणिक शास्त्रों के अनुसार मानव शरीर की कल्पना भी मिट्टी के कलश से की जाती है। इस शरीररूपी कलश में प्राणिरूपी जल विद्यमान है। जिस प्रकार प्राणविहीन शरीर अशुभ माना जाता है, ठीक उसी प्रकार रिक्त कलश भी अशुभ माना जाता है।

इसी कारण कलश में दूध, पानी, पान के पत्ते, आम्रपत्र, केसर, अक्षत, कुंमकुंम, दुर्वा-कुश, सुपारी, पुष्प, सूत, नारियल, अनाज आदि का उपयोग कर पूजा के लिए रखा जाता है। इसे शांति का संदेशवाहक माना जाता है।

माता रानी की इस भव्य कलश यात्रा के मौके पर जय मां दुर्गा कमेटी के सदस्य अध्यक्ष सुंदर कापड़ी , कोषाध्यक्ष भास्कर भट्ट , सचिव चंद्रा पाण्डेय , सचिव गंगा पाण्डेय , सचिव रेखा पाण्डेय , सचिव गीता खेतवाल और समस्त पटेल नगर के वासी मौजूद रहे ।

Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published.

To Top