उत्तराखण्ड

उत्तराखंड- छोटे से गांव से निकलकर देश के महानगरों में कला का जौहर दिखा रहे हैं सुजान विश्वास, बड़ी दिलचस्प हैं इनकी कहानी

Uttarakhand News- उत्तराखंड में शायद ही आपने ऐसा एक कलाकार देखा होगा जिसकी तस्वीरें न सिर्फ प्रेरणा देती हैं बल्कि समाज को नई दिशा देने में भी अहम योगदान निभाती हैं उनके हाथों द्वारा बनी जीवंत कलाकारी अद्भुत है यही वजह है कि उत्तराखंड के सीमांत क्षेत्र के गांव से निकलकर देश के बड़े महानगरों में लोग उनके कला की जादूगरी के कायल हैं।

उत्तराखंड के उधम सिंह नगर के सितारगंज क्षेत्र में जन्मे अतभुत कलाकार सुजान विश्वासSujan Biswas गरीबी में पले बढ़े किसान परिवार में पैदा हुए, सुजान को प्रकृति और पेड़ों से इतना लगाव है कि उनकी हर तस्वीर कैनवास में कुछ न कुछ गहरा संदेश छोड़कर जाती है। दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े बड़े महानगरों में उनकी आर्ट गैलरी आज इस बात की तस्दीक करती है कि उत्तराखंड के सीमांत क्षेत्र से निकला हुआ एक कलाकार देश और दुनिया में न सिर्फ अपनी कला की छाप छोड़ रहा है बल्कि पर्यावरण के प्रति उनके अगाध प्रेम और भविष्य की चुनौतियों को भी दर्शा रहा है।

सुजान विश्वास Sujan Biswas के बारे में यह कहा जाता है कि वह अपने चित्रों के माध्यम से ऐसे वातावरण का प्रचार करते हैं। जहां जीवन और प्रकृति के बीच संबंध समग्र रूप से विलक्षण अस्तित्व में आता है। और उनकी कला की कृतियां तथा पेड़ों की पहचान मानव के अंगों और शरीर के अंगों की पहचान के साथ विलीन हो जाती है ताकि पर्यावरण और मानव का एक अजय गठबंधन बनाया जा सके और उनकी यह तस्वीरें अपने आप में खूबी बयान करने के लिए काफी है।

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  • सुजान कुमार विश्वास Sujan Biswas के बचपन के मित्र जो कि वर्तमान में बीएसएनएल में कार्यरत हैं बिन्दुखत्ता निवासी आनंद गोपाल सिंह बिष्ट अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि…….
सुजान कुमार विश्वास मूल रूप से बांग्लादेश के आए हुए शरणार्थी परिवारों में से थे, जिन्हें बांग्लादेश सृजन के समय यहां शक्ति फार्म में बसाया गया था, वह एक गरीब किसान परिवार से थे और कक्षा 6 से दसवीं तक मेरे साथ पढ़े थे, बहुत ही शांत स्वभाव के थे हमेशा अपनी कॉपी में होमवर्क करने के पश्चात खाली समय में कुछ ना कुछ चित्र बनाया करते थे उनके चित्र बनाने कि इस कला के हम बचपन से ही फ्रेंड थे बहुत ही सुंदर चित्र बनाया करते थे बहुत ही शांत स्वभाव और नरम हृदय के थे बचपन से मैं विकलांग था जिस कारण अन्य बच्चे स्कूल में मुझे चिढ़ाया करते थे वह उन सभी बच्चों को बड़े ही शांत भाव से समझाते थे कि विकलांगों के साथ ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए इसी कारण से मेरी उनसे बहुत अच्छी मित्रता थी, कालांतर में उन्होंने राजकीय इंटर कॉलेज शक्ति फार्म से 12वीं की परीक्षा पास की उसके बाद वह दिल्ली आ गए और दिल्ली में उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी से आर्ट विषय पर ग्रेजुएशन किया तथा स्कूल की 30 का खर्चा वह ओवर टाइम जॉब करके निकाला करते थे उनकी सादगी और मित्रता भरे व्यवहार का मैं आज भी कायल हूं इतना बड़ा कलाकार होने के बाद भी आज भी उनके अंदर कोई घमंड नहीं है, वह अपने सभी मित्रों से आज भी वैसे ही मिलते हैं जैसे बचपन में मिला करते थे।
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