कुमाऊँ

पढ़िए शानदार काव्य “मैं पहाड़ी हूं लेकिन पहाड़ नहीं जाऊंगा”

मै पहाड़ी डॉक्टर हूँ,
पर पहाड़ नहीं जाऊंगा।
मै पहाड़ी मास्टर हूँ,
पर पहाड़ में नहीं पढ़ाऊँगा।।

मै पहाड़ी बाबू हूँ,
पहाड़ के दफ्तर में नहीं बैठना है।
यू पी के वक्त पहाड़ में नौकरी की ललक थी,
पर अब मुझे पहाड़ नहीं लौटना है।।

मै पहाड़ी वकील हूँ,
पहाड़ में सेवा नहीं दूंगा।

मै पहाड़ी सामाजिक आदमी हूँ,
पहाड़ के लिए सोचूंगा,
पर शहर में ही रहूंगा।
शहर में चिन्तन मंथन करूंगा।।

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पहाड़ी गीत गायक हूँ,
शहर से ही पीड़ा गाऊंगा।
पहाड़ी साहित्याकर हूँ,
शहर से ही लिखना चाहूंगा।।

पहाड़ी बिजनेस मैन हूँ,
पर धंधा शहर में ही करंगा।
खनन वहां की नदियों से करके,
वहाँ के लोगो में मनमाने दाम धरूँगा।।

पहाड़ी पत्रकार हूँ,
पर शहर से ही खबर लिखूंगा।
सरकार से एड लेकर,
लम्बी गाडी में पहाड़ घूमता दिखूंगा।।

विधायक संसद पहाड़ से बना हूँ,
पर शहर में दरवार लगाऊंगा।
जब कोई आपदा आएगी वहां,
तभी मै चमचों साथ जाऊँगा।।

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जो पहाड़ में बचे है वह क्या करेंगे,
बस मौक़ा मिलते वह भी यहाँ से चलेंगे।

फिर पहाड़ में कौन रहेगा ?
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अग्रवाल स्वीट, नेपाली मोमॉज
पंजाबी रेस्टोरेंट और गुप्ता लॉज।
नाज़िमाबाद बैंड, राजस्थानी लुहार।
यूपी टूर ट्रेवेल्स और गुजरती सुनार।।

पान की पिक और विहारी खैनी,
यादव प्रोपर्टी और बिल्डर सैनी।
पारस दूध और हलाली मीट वाला,
बंगाली डाक्टर और लेदर सीट वाला।

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फिर पहाड़ी खुश !
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अपने मुसीबतो का पहाड़,
देशीयों के गले फंसा दिया है।
दिल्ली पंजाब हल्द्वानी देहरादून में,
इनकी पाचस गज पर मकान बना लिया है।
अब ज़िन्दगी आराम से कटने लग जाएगी,
बच्चो की ज़िन्दगी सवारने लग जाएगी।

कृपाल बिष्ट सामाजिक कार्यकर्ता
ग्राम नौला
पोस्ट ऑफिस शीतलाखेत
जिला अलमोड़ा

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