गढ़वाल

देवभूमि के इस क्षेत्र में लगता है हिंडोला महोत्सव, जानिए इस अनोखे महोत्सव के बारे में

Chamoli News- देवभूमि के कंठ कंठ में भगवानों का वास है यहां हर इलाके में देवताओं की विभिन्न कहानियों के उदाहरण भी मौजूद रहे हैं। देवभूमि में विराजमान हर छोटे बड़े मंदिर के स्थापना की अपनी एक अलग कहानी है जो पूरे देश में देवभूमि को अलग महत्व से जोड़ती है । ऐसी ही कहानी उत्तराखंड के चमोली जिले के कोठली गांव के शिव मंदिर की है । यहां एक महोत्सव होता है जो अपने आप में विशेष महत्व रखता है।

हिंडोला महोत्सव

चमोली जिले के गांवों में कई अनछुए पहलू हैं जिनकी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को आज भी ग्रामीण जिंदा रखे हुए है। ऐसा ही एक मेला जो प्रचीन समय से ही कोठली के ग्रामीणों द्वारा महादेव ओर पार्वती की कहानी से जोड़कर इस मेले का आयोजन किया जाता है।

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चमोली जिले के नरायनबगड क्षेत्र के कोठली गांव के शिव मंदिर में हिंडोला महोत्सव के नाम से आयोजन किया जाता है, इस मेले में आसपास के 16 ग्राम पंचायतें कोट,सुनभि, भुलकवानी,सैंज, जाख पटयूं, भटियाना,कफ़ारतीर आदि शामिल होकर इसकी भब्यता को बढ़ाते हैं।

कैसे आयोजित होता है हिंडोला महोत्सव

हिंडोला(झूला) महोत्सव में बड़े झूले को स्थापित किया जाता है और जब तक वह जीर्ण शीर्ण अवस्था में नहीं आ जाता है तब तक वहां पर दूसरा झूला स्थापित नहीं किया जाता है तो ग्रामीणों द्वारा एक पारंपरिक मान्यता के अनुसार हिंडोला के पुराने होने का इंतजार किया जाता है और जब पूरी तरह से जीर्ण शीर्ण अवस्था में झूला आ जाता है तो हिडोला महोत्सव के रूप में नये झूले को स्थापित किया जाता है इस दौरान 16 गांव के ग्रामीणों के साथ दूर-दूर से लोग इस पल के साक्षी बनने के लिए पहुंचते हैं और माता पार्वती और भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

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हिंडोला महोत्सव में लगाये गए हिंडोला(झूला) जब झूला कई वर्षों बाद जीण क्षीण अवस्था मे हो जाता है जो लगभग 25 से 30 साल का समय लगता है

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यह है मान्यता

मान्यता है कि जब शिव पार्वती जी अटखेलियां करते थे तो इस जगह झूला झूलने आते थे प्राचीन भाषा मे हिण्डोली खेलने आते थे तो उनके ही इस खेल को आगे जा कर इसे हिंडोला महोत्सव नाम दिया गया है ढोल दमाऊ और मंत्रोचार से स्थानीय पुजारी पूजा करके इन्हें स्थापित करते है तत्पश्चात इसपे झूला झूलते है ।

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